गौसेवा से हमें वंचित क्यों किया जा रहा है?

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क्या आपकी दृष्टि में यह हम सनातनियों की गाय माँओं  के साथ सरकार अन्याय नहीं कर रही है…?

रायसेन कलेक्टर की कार्रवाई से तो यही लगता है कि वे सनातन के विरुद्ध व्यवस्था कर रहे हैं!

रायसेन कलेक्टर गौमाता और गौवंश को सड़क पर रहने देने से रोक रहे हैं

अपने सुविधा संपन्न संरक्षित आश्रय स्थल में आनंदित गौवंश!

और उनका यह कृत्य हिन्दुत्व के विरुद्ध है! उत्तर प्रदेश में तो गौमाता और गौवंश को खेतों की फसल चरने से रोकने कंटीले तारों आदि से रोकथाम करने तक को अपराध बना दिया गया है… यानी उत्तर प्रदेश में गौमाताओं को किसी भी किसान की कोई भी पकी अधपकी फसल चरने का अप्रत्यक्ष वैधानिक संरक्षण दिया गया है ! यह राम राज्य नहीं तो और क्या हुआ?

हममें से अधिकांश ने गाय माँ का बोझ प्रशासन की सड़कों पर सुलाने का अधिकार मिलने के दम पर ही तो यानी ‘माँओं’ को सड़क पर रखने की जगह देखकर ही तो माँओं को पाला था! नहीं तो हम सनातन लोगों में कौन अपनी माँ को अपने दम पर पाल सकता था?

और यहाँ हमारे मध्य प्रदेश में …. ? स्वयंभू गौसेवक मुख्यमंत्री जी के कार्यालय और आवास से मात्र 60 किलोमीटर दूर माननीय के गृह जिले और चुनाव क्षेत्र से 50 किलोमीटर के आसपास रायसेन में गौवंश को उनके रहने के परंपरागत स्थान में रहने से रोकने सरकारी अमले का उपयोग किया जा रहा है! यह निंदनीय है! गौरक्षक और गौसेवक सहन नहीं करेंगे और व्यवस्था परिवर्तन हेतु प्रयास शुरू भी कर ही चुके होंगे!

हमारे सार्वभौमिक महानतम धर्म में तो गाय हम हिन्दुओं की माता है !

युगों से हमारी यही रीत चली आ रही है कि हम सनातन अपनी (सभी प्रकार की) माँओं का भरपूर दोहन करने के अधिकारी हैं! और जब वह दोहन योग्य ना रहें तो उन अनुपयोगी माँओं  को शांति पूर्वक जीने सड़क पर छोड़ दें! यदि लौटकर हमारे घर की आये तो डंडा उठायें… माँ को दिखायें… और जरूरत पड़े तो माता के भले के लिए 2-4 फटकार भी दें!

अब माँ तो माँ है! चाहे वो जन्मदात्री माँ हो, मातृभूमि हो, देवी माँ हो या फिर गौमाता ही हो! जन्मदायिनी भोजन कराने योग्य भी ना रहे और ना ही किसी सम्पत्ति की मालकिन हो, तो ऐसी माँ से यथा शीघ्र छुटकारा ही माँ की अगली पीढ़ियों सहित सबके के हित में होगा ! जो मातृभूमि जीवनयापन के साधन योग्य रोजगार या अनुदान भी ना दे सके उस मातृभूमि का परित्याग तो धर्म सम्मत है ही! जो देवीमाँभीख में बारंबार माँगने पर भी (जो हम हर शक्ति संपन्न के सामने बड़े गौरवशाली तरीके से कर लेते हैं!), सुखसुविधा का वरदान ना दे सके उस देवीमाँ को पूजने में कैसी समझदारी? और दूध दोहने के बाद गौमाता की अगले दोहन से पहले क्या उपयोगिता और गौमाता जब दोहने योग्य दूध उत्पादन के पूर्णतः आयोग्य हो जाये तब तो उसे खिलाने पिलाने बिठाने की व्यवस्था का क्या औचित्य? इसीलिए कभी किसी युग में, जीवन युक्त किन्तु मृत्यु की प्रतीक्षा में जीती गौमाँओं और गौवंश को, सभ्य वस्तियों में बसे घरों से दूर सड़कों पर रखने की परम्परा बनाई गई। वर्तमान में सड़कें ही उनका सर्वश्रेष्ठ आश्रय स्थल हैं! हमारी हिन्दू राष्ट्रवादी सरकारों के संरक्षण में यही सबसे #युक्ति_संगत_परम्परा प्रमाणित भी हुई है! …और जब पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों में गौवंश को सर्वाधिकार और अभय दान प्राप्त हैं तो मध्यप्रदेश में उनसे सड़कों पर रहने का अधिकार क्यों छीना जा रहा है? यह तो गौमाता का और हम सभी गौसेवकों का धार्मिक अधिकार है! जो भी इस अधिकार की राह में वाधा बने उसे मिटा देना या हटा देना ही उचित नहीं है क्या?
ऐसे में यदि ये रायसेन के कलेक्टर महोदय,  हमारी गौमाँ की सेवा के हमारे परम्परागत तरीके से हमें रोकने का दुस्साहस कर रहे हैं तो इनपर अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही #माननीय_मुख्यमंत्री_जी? रायसेन के कलेक्टर की ‘अनैतिक’ व्यवस्था पर पढ़िए दैनिक भास्कर भोपाल में छपा यह समाचार…

रायसेन #कलेक्टर की #नई_पहल: रोड से मवेशियों को हटाने के लिए नगरपालिका ने 8 कर्मचारियों की लगाई ड्यूटी
https://dainik-b.in/cVLHvDReotb

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