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जन्म-मृत्यु, स्वर्ग नर्क तथा मोक्ष!

जन्म-मृत्यु, स्वर्ग नर्क तथा मोक्ष!


यह जो मृत्यु लोक कहलाता है इसे ही शास्त्रों में कई जगह भुक्ति लोक भी कहा जाता है और बस यही वह प्रत्यक्ष यथार्थ है जिसमें समस्त नियति की सारे गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं!
पाताल लोक समुद्र तल से समुद्र तट के बीच की जगह है और स्वर्ग व नर्क केवल संकलित कर्मफल आधारित जन्म के माध्यम से इसी मृत्यु लोक में हैं! कहीं शुभ और अशुभ दोनों ही प्रकार के कर्म संकलित होते रहते हैं और इनके धारक जीव और मनुष्य या तो कुत्ता, गाय, बैल आदि का उत्तम जन्म पाकर स्वर्ग पा लेते हैं या संचित कर्मानुसार समस्त नकारात्मक कर्मों के दंड स्वरूप नर्क के नाम से वर्णित कर्म फल भुगतने   किसी और लोक में ना  भेजे जाकर पुनः इसी मृत्यु लोक में नाली के कीड़ों जैसे विभिन्न रूपों में जन्म देकर भेज दिये जाते हैं…! अति हिंसक पशु व हिंसक पशु समान मानवों को अगले जन्म या अनेक जन्मों तक हिरण, खरगोश, मुर्ग़ा आदि बनाकर भेजा जाता रहता है जो बारम्बार हिंसक  जानवरों व मनुष्यों के शिकार बनते रहते हैं..! सनातन में 84,00,000 प्रकार के नर्क और इतनी ही जीव प्रजातियां वर्णित हैं … विज्ञान भी लगभग इतने ही प्रकार के जीवजंतु वनस्पति आदि के स्वरूपों में कुल प्रजातियों का होना बताता है!
इसी तरह स्वर्ग वह है जो अच्छे कर्मों के कारण उच्च प्रतिष्ठित कुल में जन्म का कारण बनता है! और मोक्ष वह मानवीय मानसिक स्थिति है जिसमें; कोई व्यक्ति,  अन्य वनस्पतियों व  जीवजगत के प्रति अनाहत भाव रखे। जो अपने-पराये, आनंद-कष्ट, हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, सुविधा-असुविधा के प्रति पूर्णतः निरपेक्ष रह सके, सदैव न्यायी रहे, तो उसे वैसा ही सर्वज्ञ समान मोक्षदा मन:स्थिति सहित जन्म मिलेगा और सर्वमान्य प्रतिष्ठा की प्राप्ति होगी…  अथवा वह उस परमऊर्जा मे़ ही समाहित कर लिया जायेगा जिस परमऊर्जा के कण मात्र अंश की उपस्थिति होने और बनी रहने तक ही हर एक जीव में जीवनसंचारित होता है! जिस भारहीन कणांश के देह से निकलते ही देह निष्क्रिय निर्जीव हो मृत कहलाती है! मोक्ष प्राप्त व्यक्ति उन जीवनकणों के महासागर जिसे मैं परमऊर्जा श्रोत कहकर बता रहा हूँ उसी में समाहित हो जाता है! यही जीव की परम सद्गति कहलाती है! जब जीव आदेश पालक ना रहकर  सत्कर्मों के स्वैच्छिक निर्देशक की तरह हो जाता है..!
ऐसे विरले व्यक्ति जिनमें इच्छा जागने मात्र से ही शुभ कार्य संपन्न होना संभव हो जाता हो वैसे वास्तविक संत-जन (सज्जन) मोक्ष प्राप्ति के सन्निकट माने जा सकते हैं! 

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Author: traffictail

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