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भविष्य का भारत मोदी जी को किस रूप में याद करेगा?

भविष्य का भारत मोदी जी को किस रूप में याद करेगा?

माननीय को धारा 370 हटाने, श्रीराम मंदिर के निर्माण, बेकरीकांड, अडानी अम्बानी से मैत्री, जैसे कार्यों के लिए इतिहास याद रखेगा!
जबकि इनके कार्यकाल में इससे अधिक महत्वपूर्ण और बड़ी कार्ययोजनाओं पर भी काम हुआ और हो रहा है !

जैसे एलईडी पर सब्सिडी, इलेक्ट्रिक व्हीकल का प्रचार प्रसार, पिछली सरकारों की राष्ट्रीय हितकारी अधूरी योजनाओं को पूरा करना जैसे- कंप्यूटरीकरण (डिजिटल इंडिया), आधार (नंदन नीलेकणी प्रोजेक्ट), डीबीटी (1 रु की सरकारी मदद का 15 पैसे हितग्राही तक पहुंचने के स्वीकार और 85 पैसे की हानि को बचाने के संकल्प) आदि !
भारत की सशक्त अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति दर्ज कराने, युक्तियुक्त रोजगार सहायक मुद्रा योजना, जैसे अनेक छोटे बड़े सार्थक कामों के लिए किया जाना चाहिए था!

वैसे ही जैसे

मनमोहन जी का नाम 2008–09 की वैश्विक आर्थिक मंदी से भारत को अप्रभावित रखने वाली अर्थव्यवस्था के जनक के रूप में दर्ज और अमर होना चाहिए था. जिसे उस मंदी के बाद विकसित राष्ट्रों ने भी अपनाने का निर्णय किया! मनमोहन जी को विश्व के सर्वाधिक शिक्षित एवं सुसंस्कृत राष्ट्राध्यक्ष के लिए याद किया जाना चाहिए था! किंतु प्रतिवर्ष कम से एक संवाददाता सम्मेलन (Press conference) करने वाले मनमोहन जी को उनके मौन (कम बोलने) रहने और कठपुतली पदेन के रूप में याद किया जाने वाला है!

समय बदलता है तो जनसाधारण की सोच भी बदलती है !

और

यदि एक झूठ को सौ-सौ बार बोला जाये तो जनमानस के मन में झूठ ही सच हो जाता है!

इसीलिए जिस उत्पाद की उपयोगिता को लगातार महीनों सालों दिन-रात प्रचारित -प्रसारित प्रोपेगेट किया जाता है वही जन जन का प्रिय बन जाता है. उदाहरणार्थ

लता, जया और सुषमा सबकी पसंद …” के दावे वाले दुष्प्रचार ने उस वाशिंग पाउडर को शीर्ष पर पहुँचाया और दसकों बनाये भी रखा किन्तु अन्य श्रेष्ठ उत्पाद निर्माता प्रतिस्पर्धियों ने धीरे धीरे स्थान बनाना शुरू किया और नकली दावों से दसकों तक नंबर एक पर बने रहने वाला वो तुलनात्मक निम्न स्तरीय उत्पाद यथार्थ से पराजित हो बाजार से बाहर भी हो गया!

अंतिम विजय सत्य की ही होनी होती है किन्तु अंतिम से पहले, यानी दसकों तक, दुष्प्रचार के दम पर, घटिया भी स्थापित रह सकता है!

इंदिरा जी का नाम आंतरिक इमरजेंसी के लिए अमर है ! हालांकि अमर होने वाला महत्वपूर्ण काम तो उनने बांग्लादेश को स्वतंत्र कराकर किया था!

नरसिम्हा राव जी को उनके चुपचाप कठिन और सशक्त निर्णयों के लिए याद रखा जाना चाहिए था किन्तु उन्हें गिना ही नहीं जाता …

अटल जी को उनके स्कूल चलें हम, नदी जोड़ो और प्रधानमंत्री सड़क योजना के जैसे कामों के लिए, और नेता प्रतिपक्ष रहते हुए यूएनओ में भारत का प्रतिनिधित्व करने भेजे जाने जैसी विलक्षण योग्यता के लािए किया जाना चाहिए किंतु ऐसा है नहीं…

चौधरी चरण सिंह जी, मोरारजी देसाई जी, विश्वनाथ प्रताप सिंह जी, लालबहादुर शास्त्री जी, चंद्रशेखर जी, गुलज़ारी लाल नंदा जी, में से हर एक का कार्यकाल अल्पकालिक रहा इनने से सभी ने कुछ ना कुछ विशेष अवश्य लागू किया… किन्तु इनमें से अधिकांश को उनके समय में हुई विवादित घटनाओं के लिए याद किया जाता है! आप स्वयं ही याद करके (या गूगल करके) देख लीजिए… !

राजीव जी का नाम आधार कार्ड के आधार नंदन नीलेकणी योजना, डीबीटी की संकल्पना, कंप्यूटरीकरण आदि क्रांतिकारी योजनाओं की संकल्पना और स्थापना के लिए की जानी चाहिए थी किन्तु राजीव गांधी जी को याद किया जाता है चीन के जमीन हड़पने को, सिख दंगों में बड़े नेताओं के सम्मिलित होने के प्रश्न को साधारण घटना कहने के लिए … और देश की भ्रष्ट व्यवस्था के स्वीकार के लिए (क्या उस स्वीकार की आलोचना होनी चाहिए थी जो सुधार की आधारशिला रखने के संकल्प की प्रेरणा बना?) जाता है!

लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी त्रुटि ही यह है कि भारत जैसे देशों में बहुसंख्यक सामान्य जन अल्पशिक्षित है अतः बहुसंख्यक जन-मानस राष्ट्रीय हित अहित के विषयों तक पहुंचने में ही सक्षम नहीं है फिर उनके उचित अनुचित के आंकलन तक पहुंचने का तो प्रश्न ही नहीं उठता ! इसीलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता-निर्धारण का आधार लोकलुभावन मुद्दों तक ही सीमित रहता है ! और शायद इसीलिए ऐसे देशों में जहां अशिक्षित बहुसंख्यक हैं वहां का शिक्षित मतदाता हताश, निराश और उदासीन हो मतदान से ही दूरी बनाये रखता है! क्योंकि चुनाव परिणाम में उसकी भूमिका बहुत छोटी हो गई है !

मेरी दृष्टि में ऐसे शिक्षित राजनैतिक उदासीन और निष्क्रिय नागरिक राष्ट्र के लिए वैसे कृतघ्न बच्चों जैसे हैं जो दायित्व विमुख हो माता-पिता से मुंह मोड़ चुके हों!

Sat Darshan
Author: Sat Darshan

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